सनातन धर्म में पराम्बा आदि शक्ति योगमाया माँ दुर्गा देवी का प्रमुख स्थान है। माँ दुर्गा अज्ञान रूपी राक्षसों का नाश कर मानव जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाली हैं। महिषासुर नामक राक्षस का वध करने के कारण उनका नाम महिषासुरमर्दिनी पड़ा।
दुर्गा सप्तशती पाठ नवरात्रि के दिनों में कराया जाता है जिसमें प्रत्येक दिन दुर्गा जी का योग्य ब्राह्मणों द्वारा विधि विधान से पूजन अर्चन करके एक पाठ का परायण किया जाता है।
माँ दुर्गा के नौ रूपों में से छठीं रूप माँ कात्यायनी का है। जिन कन्याओं के विवाह में विलंब हो रहा हो उन्हें माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए। माँ कात्यायनी रोग दोष संताप आदि को विनष्ट कर सुखों को देने वाली हैं। माँ कात्यायनी अमोघ फल देने वाली हैं और यह व्रज मण्डल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में विद्यमान हैं। ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नमः॥ कुंवारी कन्याओं को विवाह के लिए इस मंत्र का 21000 जप स्वयं अथवा योग्य ब्राह्मणों द्वारा कराना चाहिए।
शीतला माता की पूजा सभी प्रकार के ज्वर, चर्म रोग, कुष्ठ रोग आदि के निवृत्ति के लिए किया जाता है। शीतला माता की विधि विधान से पूजन अर्चन करने के बाद ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः इस मंत्र का हमें सवा लाख 1,25,000 जप करना चाहिए अथवा शीतलाअष्टक स्तोत्र का 1100 पाठ योग्य ब्राह्मणों द्वारा कराना चाहिये।